Nov 28 2021 / 4:30 PM

काल भैरव जयंती 2021: जानिए शुभ मुहूर्त, महत्व, तिथि और पूजन विधि

Spread the love

हर माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कालाष्टमी का व्रत मनाया जाता है, लेकिन मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को कालभैरव जयंती के तौर पर मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान कालभैरव का अवतरण हुआ था। इस साल कालभैरव की जयंती 27 नवंबर, शनिवार के दिन पड़ रही है। इस दिन भगवान भैरव की पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।

बता दें कि भगवान भैरव भगवान शिव का ही रोद्र रूप हैं। इस दिन सुबह स्नान वगैरह करने के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद रात के समय कालभैरव की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती है।

कालभैरव जयंती का महत्व

कालभैरव जयंती के मौके पूजा वगैरह करने से व्यक्ति को डर से मुक्ति प्राप्त होती है, ऐसी मान्यता है कि कालभैरव की पूजा करने से ग्रह बाधा और शत्रु वगैरह दोनों से ही मुक्ति मिलती है। ग्रंथों के अनुसार अच्छे कार्य करने वाले लोगों के लिए कालभैरव भगवान का स्वरूप हमेशा ही कल्याणकारी रहता है। वहीं, अनैतिक कार्य करने वालों के लिए वे हमेशा दंडनायक रहे हैं। इतना ही नहीं, ये भी कहा जाता है कि जो भी भगवान भैरव के भक्तों के साथ अहित करता है, उसे तीनों लोकों में कहीं भी शरण नहीं मिलती है।

कालभैरव जयंती का शुभ मुहूर्त

मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्ष अष्टमी आरंभ- 27 नवंबर 2021 को है। शनिवार को सुबह 05 बजकर 43 मिनट से लेकर मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्ष अष्टमी समापन- 28 नवंबर 2021 को रविवार को प्रात: 06:00 बजे तक रहेगा।

कालभैरव की पूजन विधि

कालभैरव अष्टमी तिथि के दिन सुबह को स्नान वगैरह करने के बाद बाद साफ वस्त्र धारण करें और व्रत करें। इस दिन भगवान शिव के समक्ष दीपक जलाकर पूजन अर्चना की जाती है। वहीं, मान्यता है कि कालभैरव भगवान का पूजन रात के समय में करना चाहिए। कालभैरव अष्टमी के दिन शाम के समय किसी मंदिर में जाकर भगवान भैरव की प्रतिमा के सामने चौमुखा दीपक जलाएं और उनकी पूजा सच्चे मन से करें।

भगवान को फूल, इमरती, जलेबी, उड़द, पान, नारियल वगैरह चीजें अर्पित करें। इसके बाद, भगवान के सामने आसन पर बैठकर कालभैरव चालीसा का पाठ जरूर करें। पूजन पूर्ण होने के बाद आरती गान अवश्य करें। साथ ही जानें-अनजाने कोई गलतियों हुई है तो उसकी क्षमा याचना मांगें।

Chhattisgarh