Sep 21 2021 / 11:47 PM

गुरु पूर्णिमा 2021: जानें क्या है महत्व, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

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आषाढ़ मास का पूर्णिमा है। इस दिन गुरु पूर्णिमा मनाने का विधान है। हमारे समाज में गुरु का स्थान हमेशा ही सर्वोच्च रहा है, उन्हें ईश्वर के समान माना गया है। गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप माना जाता है। आषाढ़ पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा के दिन गुरु की पूजा की जाती है और उन्हें सम्मान दिया जाता है।

ऋषि पराशारा और सत्यवती के पुत्र और महाभारत, वेद, उपनिषद और पुराणों के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म आज ही के दिन हुआ था। इसलिए यह दिन उन्हें समर्पित है। वेद व्यास को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है।

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही क्यों मनाते हैं यह पर्व-

महर्षि वेद व्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही हुआ है। आज से करीब 3000 ई. पूर्व जन्म लेने वाले महर्षि वेद व्यास ने वेदों, उपनिषदों और पुराणों की रचना की। इसलिए उन्हें समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। इस दिन वेद व्यास जी की पूजा की जाती है और जिसे भी अपना गुरु मानते हैं उनकी पूजा करते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा होने के कारण आज के दिन लोग व्रत भी रखते हैं।

गुरु पूर्णिमा शुभ मुहूर्त-

हिंदू पंचांग के अनुसार, आषाढ़ मास की पूर्णिमा 23 जुलाई को सुबह 10 बजकर 43 मिनट से शुरू होगी, जो कि 24 जुलाई की सुबह 08 बजकर 06 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि में पूर्णिमा मनाए जाने के कारण यह 24 जुलाई, शनिवार को मनाई जाएगी।

गुरु पूजन विधि-

गुरु को भगवान का स्थान प्राप्त है। गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं और गुरु ही भगवान शंकर हैं। गुरु ही ब्रह्मांड हैं। गुरु के पूजन की विधि भी भगवान के पूजन विधि जैसी ही है।

1- गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सुबह उठकर घर की साफ सफाई कर लें और फिर स्नान कर साफ कपड़े पहनें।

2- घर के मंदिर में पटिए पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाएं।

3- ऐसा करने के बाद दोनों हाथ जोड़कर इस मंत्र का उच्चारण करें – ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’

4- दसों दिशाओं में अक्षत (चावल) छोड़ें।

5- व्यासजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, गोविंद स्वामीजी और शंकराचार्यजी के नाम से पूजा का आवाहन करें।

6- अंत में अपने गुरु अथवा उनके चित्र की पूजा करके उन्हें यथा योग्य दक्षिणा प्रदान करें।

यदि आपने किसी को अपना गुरु माना है तो इस प्रकार करें पूजन-

1- सबसे पहले गुरु के चरणों को धोएं।

2- फूल, तिलक, आरती और मिष्ठान से उनकी पूजा करें।

3- उन्हें वस्त्र और दक्षिणा दें और उनके पैर छुएं।

4- गुरु का आर्शीवाद लें और गुरु को भोजन कराएं।

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