Sep 21 2021 / 2:12 PM

देवउठनी एकादशी: इस दिन होता है शालीग्राम और तुलसी विवाह, जानिए व्रत कथा

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कार्तिक मास के शुक्ल पक्षा की एकादशी को देवउठनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा होती है। वहीं इस दिन शालीग्राम और तुलसी की पूजा होती है और उनका विवाह का आयोजन भी होता है। देवउठनी एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि भी कहा जाता है।

इस मौके पर लोग पूजा करते हैं और देवउठनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करते हैं। इस बार देवउठनी एकादशी 8 नवंबर को है। इस दिन आंवले के पेड़ की पूजा विधि विधान से करते हैं। ऐसी मान्यता है​ कि देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु योग निद्रा से उठते हैं और पूर्णिमा तक आंवले के पेड़ पर ही निवास करते हैं। इस दिन देवउठनी एकादशी की कथा सुनने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

देवउठनी एकादशी व्रत कथा-

एक समय की बात है। एक राजा के राज्य में सभी लोग एकादशी का व्रत रखा करते थे। यहां तक कि राज्य के पशु भी इस दिन अन्न ग्रहण नहीं करते थे। तभी उस राज्य में एक दूसरे राज्य से एक व्यक्ति आया। उसने कहा हे राजन! मुझे काम की आवश्यकता है। यदि मुझे आप नौकरी पर रख लें तो आपका बहुत आभार होगा।

राजा ने कहा ठीक, मैं तुम्हें नौकरी जरूर दूंगा, लेकिन एक शर्त माननी होगी। शर्त यह है कि इस राज्य में एकादशी व्रत करने की अनिवार्यता है, जिसका तुम्हें भी पालन करना होगा। इस दिन तुम अन्न ग्रहण नहीं कर सकते। व्यक्ति ने कहा कि मुझे आपकी शर्त मंजूर है।

कुछ दिनों बाद एकादशी आई और राज्य के सभी लोगों के साथ उस व्यक्ति ने भी एकादशी का व्रत किया। लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरता गया, उस व्यक्ति की भूख तेज होती चली गई। वह राजा के पास पहुंचा और राजा से कहने लगा कि हे राजन सिर्फ फल से मेरा पेट नहीं भर रहा है और मैं अन्न खाना चाहता हूं, अन्यथा मैं मर जाऊंगा।

यह सुनकर राजा ने उसे अन्न दे दिया। वह नित्य की तरह नदी पर पहुंचा और स्नान कर भोजन पकाने लगा। जब भोजन बन गया तो वह भगवान को बुलाने लगा-आओ भगवान! भोजन तैयार है। बुलाने पर पीताम्बर धारण किए भगवान चतुर्भुज रूप में आ पहुंचे तथा प्रेम से उसके साथ भोजन करने लगे। भोजनादि करके भगवान अंतर्धान हो गए तथा वह अपने काम पर चला गया।

अगली एकादशी को वह राजा से कहने लगा कि महाराज, मुझे दुगुना सामान दीजिए। उस दिन तो मैं भूखा ही रह गया। राजा ने कारण पूछा तो उसने बताया कि हमारे साथ भगवान भी खाते हैं। इसीलिए हम दोनों के लिए ये सामान पूरा नहीं होता।

यह सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह बोला- मैं नहीं मान सकता कि भगवान तुम्हारे साथ खाते हैं। मैं तो इतना व्रत रखता हूं, पूजा करता हूं, पर भगवान ने मुझे कभी दर्शन नहीं दिए और तुम्हें दे दिए। ऐसा कैसे संभव है।

राजा की बात सुनकर वह बोला- महाराज! यदि विश्वास न हो तो साथ चलकर देख लें। राजा एक पेड़ के पीछे छिपकर बैठ गया। उस व्यक्ति ने भोजन बनाया तथा भगवान को शाम तक पुकारता रहा, परंतु भगवान नहीं आए। अंत में उसने कहा- हे भगवान! यदि आप नहीं आए तो मैं नदी में कूदकर प्राण त्याग दूंगा।

लेकिन भगवान नहीं आए, तब वह प्राण त्यागने के उद्देश्य से नदी की तरफ बढ़ा। प्राण त्यागने का उसका दृढ़ इरादा जान शीघ्र ही भगवान ने प्रकट होकर उसे रोक लिया और साथ बैठकर भोजन करने लगे। खा-पीकर वे उसे अपने विमान में बिठाकर अपने धाम ले गए।

यह देख राजा ने सोचा कि व्रत-उपवास से तब तक कोई फायदा नहीं होता, जब तक मन शुद्ध न हो। इसलिए व्रत के साथ यह भी जरूरी है कि अपना मन शुद्ध रखा जाए। वह भी मन से व्रत-उपवास करने लगे और अंत में स्वर्ग को प्राप्त हुए।

तुलसी-शालीग्राम विवाह

जलंधर नाम का एक पराक्रमी असुर था, जिसका विवाह वृंदा नाम की कन्या से हुआ. वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी और पतिव्रता थी। इसी कारण जलंधर अजेय हो गया. अपने अजेय होने पर जलंधर को अभिमान हो गया और वह स्वर्ग की कन्याओं को परेशान करने लगा। दुःखी होकर सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और जलंधर के आतंक को समाप्त करने की प्रार्थना करने लगे।

भगवान विष्णु ने अपनी माया से जलंधर का रूप धारण कर लिया और छल से वृंदा के पतिव्रत धर्म को नष्ट कर दिया। इससे जलंधर की शक्ति क्षीण हो गई और वह युद्ध में मारा गया। जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला तो उसने भगवान विष्णु को पत्थर का बन जाने का शाप दे दिया। देवताओं की प्रार्थना पर वृंदा ने अपना शाप वापस ले लिया। लेकिन भगवान विष्णु वृंदा के साथ हुए छल के कारण लज्जित थे, अतः वृंदा के शाप को जीवित रखने के लिए उन्होंने अपना एक रूप पत्थर रूप में प्रकट किया जो शालिग्राम कहलाया।

भगवान विष्णु को दिया शाप वापस लेने के बाद वृंदा जलंधर के साथ सती हो गई. वृंदा के राख से तुलसी का पौधा निकला। वृंदा की मर्यादा और पवित्रता को बनाए रखने के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप का विवाह तुलसी से कराया। इसी घटना को याद रखने के लिए प्रतिवर्ष कार्तिक शुक्ल एकादशी यानी देव प्रबोधनी एकादशी के दिन तुलसी का विवाह शालिग्राम के साथ कराया जाता है।

शालिग्राम पत्थर गंडकी नदी से प्राप्त होता है। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा कि तुम अगले जन्म में तुलसी के रूप में प्रकट होगी और लक्ष्मी से भी अधिक मेरी प्रिय रहोगी. तुम्हारा स्थान मेरे शीश पर होगा। मैं तुम्हारे बिना भोजन ग्रहण नहीं करूंगा। यही कारण है कि भगवान विष्णु के प्रसाद में तुलसी अवश्य रखा जाता है। बिना तुलसी के अर्पित किया गया प्रसाद भगवान विष्णु स्वीकार नहीं करते हैं।

इस दिन न करें ये काम

  • एकादशी के दौरान ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा से फल ज्यादा मिलता है इसलिए एकादशी के दिन शारीरिक संबंध से परहेज रखना चाहिए।
  • शास्त्रों में एकादशी के दिन चावल या चावल से बनी चीजों के खाने की मनाही है। मान्यता है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगनेवाले जीव की योनि में जन्म पाता है। लेकिन द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। भगवान विष्णु और उनके किसी भी अवतारवाली तिथि में चावल का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  • भगवान विष्णु को एकादशी का व्रत सबसे प्रिय है। पुराणों में बताया गया है कि इस दिन जो व्रत ना रहे हों, उन्हें भी प्याज, लहसुन, मांस, अंडा जैसे तामसिक पदार्थ का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से नरक में स्थान मिलता है।

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