एससी-एसटी ऐक्ट: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- FIR दर्ज करने से पहले प्राथमिक जांच जरूरी नहीं

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 10-02-2020 / 12:49 PM
  • Update Date: 10-02-2020 / 12:49 PM

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन कानून 2018 पर सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार को बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान में पिछले साल सरकार की तरफ से किए गए संशोधनों को बरकरार रखा है। अब एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर बिना जांच के गिरफ्तारी जारी रहेगी।

दो साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज होने पर तत्काल गिरफ्तार पर रोक लगाई थी। साथ ही आरोपियों को अग्रिम जमानत देने का प्रावधान किया था। इसके बाद सरकार ने एक्ट में बदलावों को दोबारा लागू करने के लिए संशोधन बिल पास कराया था।

जस्टिस अरुण मिश्र, जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस रवींद्र भट की बेंच ने सोमवार को इस मामले में 2-1 से फैसला दिया, यानी दो जज फैसले के पक्ष में थे और एक ने इससे अलग राय रखी। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि अगर शुरुआती तौर पर लगता है कि केस एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं बनता है तो अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है।

जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा, एससी/एसटी एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करने के पहले जांच जरूरी नहीं है। साथ ही वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं है। जस्टिस रविंद्र भट ने फैसले में कहा- हर नागरिक को दूसरे नागरिकों के साथ समानता का व्यवहार करना चाहिए। भाईचारे को बढ़ावा देना चाहिए। अगर शुरुआती तौर पर एससी/एसटी एक्ट के तहत केस नहीं बनता, तो अदालत एफआईआर रद्द कर सकती है। ऐसे मामलों में अग्रिम जमानत का खुला इस्तेमाल संसद की मंशा के खिलाफ होगा।

याचिकाकर्ता प्रिया शर्मा ने कहा, मार्च 2018 में कोर्ट ने कहा था कि एफआईआर दर्ज करने से पहले अधिकारियों से मंजूरी लेनी होगी यानी उसके बाद ही एफआईआर दर्ज होगी। लेकिन, अब एफआईआर दर्ज करने के लिए इसकी जरूरत नहीं होगी, यानी एससी/एसटी एक्ट अपने मूलरूप में लागू रहेगा। लेकिन, अगर अदालत को लगता है कि आरोपी के खिलाफ सबूत नहीं हैं, तो वह अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकता है।

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