‘मन की बात’ में बोले पीएम मोदी- जल हमारे लिए जीवन और आस्था है

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 28-02-2021 / 7:27 PM
  • Update Date: 28-02-2021 / 7:27 PM

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने जल को जीवन के साथ ही आस्था का प्रतीक और विकास की धारा करार देते हुए रविवार को देशवासियों से इसका संरक्षण करने का आह्वान किया। आकाशवाणी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम की 74वीं कड़ी में अपने विचार साझा करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण के लिए केंद्र सरकार इस साल ‘विश्व जल दिवस’ से 100 दिनों का अभियान भी शुरू करेगी।

मोदी ने कहा कि दुनिया के हर समाज में नदी के साथ जुड़ी हुई कोई-न-कोई परम्परा होती ही है और नदी तट पर अनेक सभ्यताएं भी विकसित हुई हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति क्योंकि हजारों वर्ष पुरानी है इसलिए इसका विस्तार देश में और ज्यादा मिलता है। उन्होंने कहा कि भारत में कोई ऐसा दिन नहीं होगा जब देश के किसी-न-किसी कोने में पानी से जुड़ा कोई उत्सव न हो। माघ के दिनों में तो लोग अपना घर-परिवार, सुख-सुविधा छोड़कर पूरे महीने नदियों के किनारे कल्पवास करने जाते हैं।

इस बार हरिद्वार में कुंभ भी हो रहा है। जल हमारे लिये जीवन भी है, आस्था भी है और विकास की धारा भी है। पानी को पारस से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार पारस के स्पर्श से लोहा, सोने में परिवर्तित हो जाता है वैसे ही पानी का स्पर्श जीवन और विकास के लिये जरुरी है। उन्होंने कहा कि पानी के संरक्षण के लिये, हमें, अभी से ही प्रयास शुरू कर देने चाहिए।

आगामी 22 मार्च को मनाए जाने वाले विश्व जल दिवस का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जल संरक्षण सिफ सरकार की नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी है और इसे देश के नागरिकों को समझना होगा। उन्होंने अपने आसपास के जलस्त्रोतों की सफाई के लिये और वर्षा जल के संचयन के लिये देशवासियों से 100 दिन का कोई अभियान शुरू कने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि इसी सोच के साथ अब से कुछ दिन बाद जल शक्ति मंत्रालय द्वारा भी जल शक्ति अभियान- ‘कैच द् रैन’ भी शुरू किया जा रहा है। इस अभियान का मूल मन्त्र है पानी जब भी और जहां भी गिरे उसे बचाएं। उन्होंने कहा कि हम अभी से जुटेंगे और पहले से तैयार जल संचयन के तंत्र को दुरुस्त करवा लेंगे तथा गांवों में, तालाबों में, पोखरों की सफाई करवा लेंगे, जलस्त्रोतों तक जा रहे पानी के रास्ते की रुकावटें दूर कर लेंगे तो ज्यादा से ज्यादा वर्षा जल का संचयन कर पायेंगे।

प्रधानमंत्री ने संत रविदास जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि भी दी और कहा कि आज भी उनके ज्ञान, हमारा पथप्रदर्शन करता है। उन्होंने कहा कि हमारे युवाओं को एक और बात संत रविदास जी से जरूर सीखनी चाहिए। युवाओं को कोई भी काम करने के लिये, खुद को पुराने तौर तरीकों में बांधना नहीं चाहिए। आप, अपने जीवन को खुद ही तय करिए।

पीएम मोदी ने कहा कि मुझे विश्वास है, ये देश का हर नागरिक कर सकता है। उन्होंने कहा कि आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस भी है। आज का दिन भारत के महान वैज्ञानिक, डॉक्टर सी.वी. रमन द्वारा की गई रमण इफेक्ट खोज को समर्पित है। इस खोज ने पूरी विज्ञान की दिशा को बदल दिया था। मैं जरूर चाहूँगा कि हमारे युवा, भारत के वैज्ञानिक-इतिहास को, हमारे वैज्ञानिकों को जाने, समझें और खूब पढ़ें।

उन्होंने कहा कि जब हम विज्ञान की बात करते हैं तो कई बार इसे लोग भौतिकी-रसायनशास्त्र या फिर प्रयोगशाला तक ही सीमित कर देते हैं, लेकिन, विज्ञान का विस्तार तो इससे कहीं ज्यादा है। ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ में विज्ञान की शक्ति का बहुत योगदान भी है। उन्होंने कहा कि उदाहरण के तौर पर हैदराबाद के चिंतला वेंकट रेड्डी जी हैं।

रेड्डी जी के एक डॉक्टर मित्र ने उन्हें एक बार ‘विटामिन-डी’ की कमी से होने वाली बीमारियाँ और इसके खतरों के बारे में बताया। रेड्डी जी किसान हैं, उन्होंने सोचा कि वो इस समस्या के समाधान के लिए क्या कर सकते हैं ? इसके बाद उन्होंने मेहनत की और गेहूं चावल की ऐसी प्रजातियों को विकसित की जो खासतौर पर ‘विटामिन-डी’ से युक्त हैं। इसी महीने उन्हें विश्व बौद्धिक संपदा संगठन से पेटेंट भी मिली है। ये हमारी सरकार का सौभाग्य है कि वेंकट रेड्डी जी को पिछले साल पद्मश्री से भी सम्मानित किया था।

ऐसे ही लद्दाख के उरगेन फुत्सौग भी काम कर रहे हैं। उरगेन जी इतनी ऊंचाई पर जैविक तरीके से खेती करके करीब 20 फसलें उगा रहे हैं वो भी साइकिल तरीके से, यानी वो, एक फसल के कचड़े को, दूसरी फसल में, खाद के तौर पर, इस्तेमाल कर लेते हैं। इसी तरह गुजरात के पाटन जिले में कामराज भाई चौधरी ने घर में ही शाहजन के अच्छे बीज विकसित किए हैं। अच्छे बीजों की मदद से जो शाहजान पैदा होता है, उसकी गुणवत्ता भी अच्छी होती है।

अपनी उपज को वो अब तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल भेजकर, अपनी आय भी बढ़ा रहे हैं। आजकल स्वाथ्य के प्रति जागरूक लोग चिया सीड्स को काफी महत्व देते हैं और दुनिया में इसकी बड़ी मांग भी है। भारत में इसे ज्यादातर बाहर से मंगाया जाता है, लेकिन अब, चिया सीड्स में आत्मनिर्भरता का बीड़ा भी लोग उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हरिश्चंद्र जी ने चिया सीड्स की खेती शुरू की है।

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