जानें आखिर क्यों मनाते हैं मकर संक्रांति

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 10-01-2019 / 7:38 PM
  • Update Date: 10-01-2019 / 7:39 PM

मकर संक्रांति का त्यौहार हिन्दुओं का प्रमुख त्यौहार है। भारत में हर साल मकर संक्रांति 14 जनवरी को मनाया जाता है। मकर संक्रांति भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग अलग रूप से मनाया जाता है। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में भी मनाया जाता है।

इस दिन अँधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की बनी हुई गजक और रेवड़ियाँ आपस में बाँटकर खुशियाँ मनाते हैं। बहुएँ घर-घर जाकर लोकगीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं।

मकर संक्रांति क्यों मनाते है-
उत्तर प्रदेश मे यह मुख्य रुप से दान का पर्व है। इलाहाबाद (प्रयागराज) मे गंगा यमुना और सरस्वती के संगम पर हर साल एक महीने तक मेला लगता है। जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। बिहार मे मकर संक्राति को खिचड़ी के नाम से मनाया जाता है। तमिलनाडु मे इसे पोंगल के रूप में मनाते है।

जबकि कर्नाटक केरल और आंध्र प्रदेश में इसे केवल संक्रांति ही कहते हैं। मकर संक्रांति के त्योहार को पौष महीने मे जब सूर्य मकर राशि पर आता है। तब इस त्योहार को मनाया जाता है। इस त्योहार की विशेष बात यह है।

कि यह और त्योहारों की तरह अलग-अलग तारीखों पर नहीं बल्कि हर साल 14 जनवरी को ही मनाया जाता है। जब सूर्य उत्तरायण होकर मकर रेखा से गुजरता है। कभी-कभी यह एक दिन पहले या बाद में यानि 14 या 15 जनवरी को भी मनाया जाता है, लेकिन ऐसा कम ही होता है।

मकर संक्रांति महत्व-
ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उनके घर जाते हैं। क्योकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं इसी वजह से इस दिन को मकर संक्रांति के नाम से जाना जाता है। मकर संक्रांति के साथ अनेक पौराणिक तथ्य जुड़े हुए हैं।

जिसमें से कुछ के अनुसार भगवान आशुतोष ने इस दिन भगवान विष्णु जी को आत्मज्ञान का दान दिया था। इसके अतिरिक्त देवताओं के दिनों की गणना इस दिन से ही शुरु होती है। सूर्य जब दक्षिणायन में रहते है। तो उस अवधि को देवताओं की रात्री व उतरायण के 6 महीने को दिन कहा जाता है।

महाभारत की कथा के अनुसार भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए भी मकर संक्रांति का दिन ही चुना था। मकर संक्रान्ति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं।

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