पीरियड्स में करते हैं महिलाओं का तिरस्कार…तो जानें कामाख्या देवी मंदिर दास्तान

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 15-10-2017 / 1:29 AM
  • Update Date: 15-10-2017 / 1:29 AM

गुवाहाटी। भले ही हम नए समाज और नई सोच की तरफ अग्रसर हो रहे हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं करेगा, कि अभी भी समाज का एक बड़ा तबका मासिक धर्म या पीरियड्स को लेकर असंवेदनशील है। पीरियड्स होने पर आज भी महिलाओं को अलग-थलग कर दिया जाता है, इतना ही नहीं देश के कुछ गांव और कस्बे तो ऐसे हैं, जहां लड़कियों और महिलाओं के साथ जानवरों से ज़्यादा बुरा बर्ताव किया जाता है।

हालांकि, अब तक ये क्लियर नहीं हो पाया है कि समाज द्वारा तैयार किए गए, मासिक धर्म से जुड़े ये कड़े नियम कानून और रीति-रिवाज किस ग्रंथ या किताब में लिखे हुए हैं। खैर इतना तो साफ है कि सदियों पहले हमारे पूर्वजों की सोच ऐसी बिल्कुल नहीं थी। क्योंकि सच में अगर मासिक चक्र के दौरान महिलाओं के साथ भेदभाव होता, तो आज कामाख्या मंदिर दुनिया का प्रसिद्ध मंदिर न होता।
असम का वही मंदिर है, जो दुनियाभर में अपनी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है। इसे तंत्र साधना और अघोरियों का गढ़ भी कहा जाता है।

गुवाहाटी से करीब 8 किलोमीटर की दूर, नीलांचल पर्वत के बीचों-बीच स्थित कामाख्या मंदिर हर रोज समाज की संकुचित सोच को उसका आईना दिखाता नजर आता है, लेकिन वो बात और है कि हम इसे देख कर भी अनदेखा कर देते हैं। आजतक आपने मंदिर से जुड़े कई रहस्यों और कथाओं के बारे में सुना होगा, लेकिन आज आपको बताते हैं मंदिर का वो दूसरा पहलू, जो पीरियड्स को लेकर संकुचित सोच को हर तरह से चैलेंज कर रहा है।

मासिक धर्म को माना जाता है पवित्र

दक्षिण भारत के अलावा, अधिकांश भारत में मासिक धर्म को अशुद्ध माना जाता है। इस दौरान महिलाओं को किसी भी शुभ कार्यों में शामिल होने पर मनाही होती है, इसके साथ ही कहीं-कहीं मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को काफी प्रताड़ित भी किया जाता है, लेकिन मासिक धर्म के दौरान कामाख्या देवी को सबसे पवित्र होने का दर्जा प्राप्त है।

कामाख्या देवी को ‘बहते रक्त की देवी’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि ये देवी का एकमात्र ऐसा स्वरूप है, जो नियमानुसार प्रतिवर्ष मासिक धर्म के चक्र में आता है। ऐसा कहा जाता है कि हर साल जून के महीने में कामाख्या देवी रजस्वला होती हैं और उनकी योनि से रक्त प्रवाह होता है, साथ ही उनके बहते रक्त से ब्रह्मपुत्र नदी का रंग लाल हो जाता है।इससे एक चीज तो साफ है कि मासिक धर्म को लेकर ये छुआ-छूत की धारणा हमारे पूर्वजों की बनाई हुई नहीं है, क्योंकि अगर मासिक धर्म को लेकर अपवित्र सोच हमारे पूर्वजों की होती, तो कामाख्या देवी को बहते रक्त की देवी न कहा जाता।

तीन दिन के लिए मां को दिया जाता है विश्राम

एक ओर जहां देश की महिलाएं चाह कर भी मासिक धर्म के दौरान आराम नहीं कर पाती, या यूं कहें कि घर और आॅफिस के चलते महिलाओं को आराम नसीब ही नहीं होता। वहीं कमाख्या देवी के मंदिर की परंपरा उसके बिल्कुल विपरीत है। हर साल जून में रजस्वला के समय तीन दिनों के लिए ये मंदिर बंद कर, मां को विश्राम करने दिया जाता है, लेकिन मंदिर के आसपास अम्बूवाची पर्व मनाया जाता है। इस पर्व में सैलानियों के साथ तांत्रिक, अघोरी साधु और पुजारी भी मेले में शामिल होने के लिए आते हैं। इस दौरान शक्ति के उपासक, तांत्रिक और साधक नीलांचल पर्वत की अलग-अलग गुफाओं में बैठकर साधना कर सिद्धियां प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

प्रसाद में दिया जाता है रजस्वला का कपड़ा

अमूनन अगर सड़क पर या किसी और जगह कोई सेनेटरी पैड या पीरियड्स का कपड़ा पड़ा दिख जाए, तो हमें घिन आ जाती है। उसे छूना तो दूर की बात, गंदे कपड़े पर नजर पड़ते ही हम सामने से मुंह फेर कर रास्ता बदल लेते हैं, है न? लेकिन क्या आपको पता है कि मां कमाख्या के रजस्वला के कपड़े को भक्तों में प्रसाद के रुप में दिया जाता है।

दरअसल, जब मां को तीन दिन का रजस्वला होता है, तो उस दौरान सफेद रंग का कपडा मंदिर के अंदर बिछा दिया जाता है। तीन दिन बाद जब मंदिर के दरवाजे़ खुलते हैं, तो वो कपड़ा पूरी तरह रक्त से भीगा होता है। इस कपड़े को अम्बुवाची वस्त्र कहते है। इसे ही भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता हैं। कहते हैं मां के रज से भीगा कपड़ा प्रसाद में किस्मत वालों को नसीब होता है।

मूरत की नहीं, योनि की पूजा होती है

अकसर लड़कियों और महिलाओं को समाज के दायरे और मयार्दा में रहने की सीख दी जाती है। इतना ही नहीं, कहीं-कहीं तो लड़कियों को खुल कर बोलने की आजादी, तो दूर उन्हें अपने मन से कपड़े पहनने की भी इजाजत नहीं होती, पर वहीं नीलांचल पर्वत के बीचों-बीच बसा मां कमाख्या का ये मंदिर समाज द्वारा बनाई हुई इन धारणाओं को भी गलत साबित करता है और यही बात इस मंदिर की खासियत है।

दरअसल, दुनियाभर में चर्चित इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है। यहां पर देवी के योनि भाग की ही पूजा की जाती है। मंदिर के अंदर एक कुंड सा बना हुआ है, जो हमेशा फूलों से ढका रहता है। इस जगह के पास में ही एक मंदिर है, जहां पर देवी की मूर्ति स्थापित है। इस जगह को महापीठ माना जाता है।

मंदिर से जुड़ी रोचक और रहस्मयी कहानियां

धर्म पुराणों के अनुसार पिता द्वारा किए जा रहे यज्ञ की अग्नि में कूदकर सती के आत्मदाह करने के बाद जब महादेव उनके शव को लेकर तांडव कर रहे थे, तब मां सती के प्रति भगवान शकंर का मोह भंग करने के लिए विष्णु भगवान ने अपने चक्र से माता सती के 51 भाग किए थे, जहां पर यह भाग गिरे वहां पर माता का एक शक्तिपीठ बन गया। यहां पर माता की योनि गिरी, जिस कारण इसे कामाख्या नाम दिया गया।

इस मंदिर के पास मौजूद सीढ़ियां अधूरी हैं। कहा जाता है कि नराका नाम के एक दानव को कामाख्या देवी से प्यार हो गया था और उसने शादी का प्रस्ताव दे डाला लेकिन देवी ने एक शर्त रखी कि अगर वो निलांचल पर्वत पर सीढ़ियां बना देगा तो वो उससे शादी कर लेंगी। वो कभी सीढ़ियां बना नहीं पाया।

इस मंदिर में कभी मादा पशु की बलि नहीं दी जाती।

कहा जाता है कि 1564 में मुस्लिम आक्रमणकारियों ने ये मंदिर तोड़ दिया था, जिसे अगले साल राजा विश्वसिंह के पुत्र नरनारायण ने फिर से बनवाया था। खैर मंदिर के तथ्य चाहें जो भी हों, पर माहवारी काल के दौरान कामाख्या देवी की आराधना कर कहीं ना कहीं हम स्त्रीत्व की आराधना करते हैं, जो समाज के लिए एक बहुत बड़ी सीख है। मां का ये मंदिर गवाह है इस बात का मासिक धर्म कोई छुआ-छूत या फिर जहरीली बीमारी नहीं है, जिस कारण महिलाओं को यूं घर से अलग-थलग कर दिया जाता है, बल्कि ये भी जीवनचक्र का एक हिस्सा है।

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