12 जुलाई को है देवशयनी एकादशी, कैसे करें व्रत, जानें एकादशी का महत्व-पूजा विधि

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 11-07-2019 / 8:45 PM
  • Update Date: 11-07-2019 / 8:45 PM

आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इस तिथि को हरिशयनी एकादशी और ‘पद्मनाभा’ के नाम से भी जाना जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ भी माना जाता है। जब भगवान श्री हरि विष्णु क्षीर-सागर में शयन करते हैं। इस वर्ष देवशनी एकादशी 12 जुलाई 2019 के दिन मनाई जाएगी।

आषाढ़ शुक्ल एकादशी को सोने बाद भगवान श्री विष्णु कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस अवधि के मध्य भगवान श्री विष्णु भादों शुक्ल एकादशी को करवट बदलते हैं। इस एकादशी का व्रत चारों पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाला है।

यह एकादशी भगवान सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश करने पर प्रारम्भ होती है और इसके साथ ही भगवान मधुसूदन का शयनकाल शुरू हो जाता है एवं कार्तिक शुक्ल एकादशी को सूर्यदेव के तुला राशि में आने पर भगवान जनार्दन योगनिद्रा से जागते हैं। लगभग चार माह के इस अंतराल को चार्तुमास कहा गया है।

एकादशी का महत्व-
“नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु:। नास्ति विष्णुसमं देवं तपो नानशनात्परम।। नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसमं धनं। नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता।। न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतं”।।

अर्थात् गंगा के सामान कोई तीर्थ नहीं है। माता के सामान कोई गुरु नहीं है। भगवान विष्णु के सामान कोई देवता नहीं है। उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है। क्षमा के सामान कोई माता नहीं है। कीर्ति के सामान कोई धन नहीं है। ज्ञान के सामान कोई लाभ नहीं है। धर्म के सामान कोई पिता नहीं है। विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है।

देवशयनी एकादशी कथा-
भागवत महापुराण के अनुसार आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को शंखासुर राक्षस मारा गया था। उस दिन से भगवान चार महीने तक क्षीर समुद्र में सोते हैं।

अन्य ग्रंथों के अनुसार भगवान विष्णु ने राजा बलि से तीन पग दान के रूप में मांगे। भगवान ने पहले पग में पूरी पृथ्वी, आकाश और सभी दिशाओं को ढक लिया। अगले पग में पूरे स्वर्ग को ढक लिया। तब तीसरा राजा बलि ने अपने सिर पर रखवाया। इससे प्रसन्न होकर उन्होंने राजा बलि को पाताल लोक का अधिपति बना दिया और उससे वरदान मांगने को कहा।

बलि ने वर मांगते हुए कहा कि भगवान हमेशा मेरे महल में रहें। भगवान को बलि के बंधन में बंधा देखते हुए माता लक्ष्मी ने बलि को भाई बनाया और भगवान को वचन से मुक्त करने का अनुरोध किया।

माना जाता है तब से भगवान विष्णु का अनुसरण करते हुए तीनो देव 4-4 महीने में पाताल में निवास करते हैं। विष्णु देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक, शिवजी महाशिवरात्रि तक और ब्रह्मा जी शिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक करते हैं।

राजा बलि ने भगवान विष्णु से मांगा था यह वरदान –
भगवान विष्णु ने राजा बलि से प्रसन्न होकर उनको पाताल लोक दे दिया और उनकी दानभक्ति को देखते हुए वर मांगने को कहा। बलि ने कहा -‘प्रभु आप सभी देवी-देवताओं के साथ मेरे लोक पाताल में निवास करें।’ और इस तरह श्री हरि समस्त देवी-देवताओं के साथ पाताल चले गए, यह दिन एकादशी (देवशयनी) का था। इस दिन से सभी मांगलिक कार्यों के दाता भगवान विष्णु का पृथ्वी से लोप होना माना गया है।

इसलिए भगवान विष्णु करते हैं शयन-
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार एक अन्य प्रसंग में एक बार ‘योगनिद्रा’ ने बड़ी कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु को प्रसन्न किया और उनसे प्रार्थना की ‘भगवान आप मुझे अपने अंगों में स्थान दीजिए’। लेकिन श्री हरि ने देखा कि उनका अपना शरीर तो लक्ष्मी के द्वारा अधिष्ठित है। इस तरह का विचार कर श्री विष्णु ने अपने नेत्रों में योगनिद्रा को स्थान दे दिया और योगनिद्रा को आश्वासन देते हुए कहा कि तुम वर्ष में चार मास मेरे आश्रित रहोगी।

पूजा का शुभ मुहूर्त –
इस साल हरिशयनी एकादशी 11 जुलाई को रात 3:08 से 12 जुलाई रात 1:55 मिनट तक रहने वाली है। प्रदोष काल शाम साढ़े पांच से साढे सात बजे तक रहेगा। माना जाता है कि इस दौरान कि गई आरती, दान पुण्य का विशेष लाभ भक्तों को मिलता है। देवशयनी एकादशी के दिन भगवान को नए वस्त्र पहनाकर, नए बिस्तर पर सुलाएं क्योंकि इस दिन के बाद भगवान सोने के लिए चले जाते हैं।

इस विधि से करें पूजन-
देवशयनी एकादशी के दिन भगवान नारायण कि मूर्ति, जिसमे चारों भुजाएं, जिसमे शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो, उसे पीले वस्त्र धारण कराकर, मूर्ति के आकार वाले सुंदर पलंग पर लिटाकर पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराएं। इसके बाद षोडशोपचार विधि से पूजन करें।

सभी एकादशियों को श्री नारायण की पूजा की जाती है, लेकिन इस एकादशी को श्री हरि का शयनकाल प्रारम्भ होने के कारण उनकी विशेष विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए। पदम् पुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन कमललोचन भगवान विष्णु का कमल के फूलों से पूजन करने से तीनों लोकों के देवताओं का पूजन हो जाता है।

‘सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जमत्सुप्तं भवेदिदम्। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्व चराचरम्।।’
हे! जगन्नाथ आप के सो जाने पर यह संपूर्ण जगत सो जाता है और आप के जागृत होने यह संपूर्ण चराचर जगत भी जागृत रहता है। इस प्रकार निवेदन करते हुए भगवान विष्णु को प्रणाम करें।

देवशयनी एकादशी व्रत के दौरान बरतें ये सावधानी-
– देवशयनी एकादशी पर सूर्य उदय से पहले उठने का प्रयास अवश्य करें।

– घर में लहसुन प्याज और तामसिक भोजन बिल्कुल भी ना बनाएं और ना ही खरीद कर लाएं।

– एकादशी की पूजा पाठ में साफ-सुथरे कपड़ों का ही प्रयोग करें, हो सके तो काले नीले वस्त्र प्रयोग न करें।

-देवशयनी एकादशी के व्रत विधान में परिवार में शांतिपूर्वक माहौल रखें।

– सभी प्रकार की शुद्ध और साफ पूजा पाठ की सामग्री ही प्रयोग में लाएं।

– पूजा में पीले फल और फूल अवश्य प्रयोग करें।

देवशयनी एकादशी व्रत का फल-
– ब्रह्म वैवर्त पुराण में देवशयनी एकादशी के विशेष माहात्म्य का वर्णन किया गया है। इस व्रत से प्राणी की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

– व्रती के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं।

– यदि व्रती चातुर्मास का पालन विधिपूर्वक करे तो महाफल प्राप्त होता है।

भूलकर भी न करें ये काम-
एकादशी के दिन व्रती को झूठ बोलने, ठगी करने, दूसरे का अहित सोचने, बड़ों का अपमान करने से बचते हुए, ब्रह्मचर्य का पूरी तरह से पालन करना चाहिए। इस प्रकार कोई भी साधक देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु कि पूजा करके दैहिक, दैविक और भौतिक अर्थात् तीनो तापों से मुक्ति पाता है और जीवन-मरण के बंधन से मुक्त होकर स्वयं नारायण में ही विलीन हो जाता है।

इस दौरान वर्जित होंगे मांगलिक कार्य-
गरुड़ध्वज जगन्नाथ के शयन करने पर विवाह, यज्ञोपवीत, संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गोदान, गृहप्रवेश आदि सभी शुभ कार्य चार्तुमास में त्याज्य हैं। इसका कारण यह है कि जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बलि से तीन पग भूमि मांगी, तब दो पग में पृथ्वी और स्वर्ग को श्री हरि ने नाप दिया और जब तीसरा पग रखने लगे तब बलि ने अपना सिर आगे रख दिया।

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