जिंदा रहने के लिए खाना पड़ी लाश

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 12-10-2017 / 1:14 AM
  • Update Date: 12-10-2017 / 1:14 AM

उरुग्वे। घटना 13 अक्टूबर 1972 की है। उरुग्वे के ओल्ड क्रिश्चियन क्लब की रग्बी टीम चिली के सैंटियागो में मैच खेलने जा रही थी, लेकिन प्लेन क्रैश हो गया। प्लेन में 45 लोग सवार थे, जिनमें से 12 की मौत प्लेन क्रैश के दौरान ही हो गई थी। अन्य 17 लोग घायल हो गए थे, जिन्होंने बाद में दम तोड़ दिया था।

इस हादसे में जो लोग बचे, उन्हे मौत से ज्यादा बुरा वक्त देखना पड़ा। बचे हुए लोगो ने जान बचाने के लिए खाने की चीजों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाट लिया ताकि वो ज्यादा दिन तक चल सके। पानी कि कमी को दूर करने के लिए उन्होंने प्लेन में से एक ऐसे मेटल के टुकड़े को निकाला जो कि धूप में बहुत जल्दी गर्म हो सके।

फिर उस पर बर्फ पिघलाकर पानी इकठ्ठा करने लगे। हालांकि, इनकी मुसीबत तो तब शुरू हुई जब खाना खत्म हो गया और कोई चारा न होने की वजह से इन लोगों ने अपने साथियों की लाश के टुकड़े करके उन्हें खाना शुरू कर दिया।हादसे में बचे डॉ. रोबटरे कानेसा ने एक इंटरव्यू में कहा था, मुझे जिंदा रहने के लिए अपने ही दोस्त का मांस खाना पड़ा। हादसे के पीड़ितों को -30 डिग्री सेल्सियस में 72 दिन गुजारने पड़े।

देखते ही देखते 60 दिन बीत गए थे और दुनिया की नजर में मर चुके इन लोगों को मदद की कोई उम्मीद दिखाई नहीं दे रही थी। ऐसे में दो खिलाड़ियों नैन्डो पैरेडो और रॉबटरे केनेसा ने सोचा पड़े-पड़े मरने से अच्छा है कि मदद की तलाश पर निकलना सही समझा। शारीरिक रुप से कमजोर हो चुके दोनो खिलाड़ियों ने बर्फ पर ट्रैकिंग करनी शुरू की और तमाम मुश्किलों का सामना करते हुए एंडीज पर्वत को पार कर चिली के आबादी वाले क्षेत्र तक पहुंच गए।

यहां दोनों ने रेस्क्यू टीम को अपने साथियों की लोकेशन बताई। इसके चलते हादसे में बाकी बचे 16 लोगों को 23 दिसंबर 1972 में बचाया जा सका। इस भयावह घटना पर पियर्स पॉल रीड ने 1974 में एक किताब हअलाइवह लिखी थी, जिस पर 1993 में फ्रेंक मार्शल ने फिल्म भी बनाई थी।

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