चातुर्मास 2019: जानें चातुर्मास महत्व, चार महीने तक न करें ये काम

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 12-07-2019 / 7:02 PM
  • Update Date: 12-07-2019 / 7:02 PM

चातुर्मास शब्द सुनते ही उन सभी साधु-संतों का ध्यान आ जाता है, जो चार मास एक ही स्थान पर रहते हुए लोगों को धर्म संबंधी ज्ञान उपलब्ध कराकर सत्य पर आधारित जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। चातुर्मास आषाढ़ शुक्ल एकादशी (इसे देवशयनी या हरिशयनी एकादशी भी कहते हैं) से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठावनी या देवोत्थान एकादशी) तक होता है। सनातन धर्म में चातुर्मास्य की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है, जिसका अनुकरण आज भी हमारे साधु-संत करते हैं।

प्रसिद्ध धर्म ग्रंथों- महाभारत आदि में चातुर्मास की महिमा का विषद् गान किया गया है। चातुर्मास असल में संन्यासियों द्वारा समाज को मार्गदर्शन करने का समय है। आम आदमी इन चार महीनों में अगर केवल सत्य ही बोले तो भी उसे अपने अंदर आध्यात्मिक प्रकाश नजर आएगा। नाम चर्चा और नित्य नाम स्मरण भी ऐसा फल प्रदान करते हैं।

इस वर्ष देवशयनी एकादशी व्रत 12 जुलाई को है। इसे पद्मा एकादशी, पद्मनाभा एकादशी भी कहा जाता है। गृहस्थ आश्रम में रहने वालों के लिए चातुर्मास्य नियम इसी दिन से प्रारंभ हो जाते हैं। संन्यासियों का चातुर्मास्य 16 जुलाई को यानी गुरु पूर्णिमा के दिन से शुरू होगा। देवशयनी एकादशी नाम से पता चलता है कि इस दिन से श्री हरि शयन करने चले जाते हैं। इस अवधि में श्री हरि पाताल के राजा बलि के यहां चार मास निवास करते हैं।

सभी मंगल कार्य निषेध-
चातुर्मास के दौरान यानी 4 माह में विवाह संस्कार, संस्कार, गृह प्रवेश आदि सभी मंगल कार्य निषेध माने गए हैं। देवोत्थान एकादशी के साथ शुभ कार्यों की शुरुआत दोबारा फिर से हो जाती है।

आने वाले चार महीने जिसमें सावन, भादौ, आश्विन और कार्तिक का महीना आता है उसमें खान-पान और व्रत के नियम और संयम का पालन करना चाहिए। दरअसल इन 4 महीनो में व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है इससे अलावा भोजन और जल में बैक्टीरिया की तादाद भी बढ़ जाती है। इन चार महीनों में सावन का महीना सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।

चातुर्मास मास में ना करें ये काम-
-चातुर्मास मास के पहले महीने सावन में हरी सब्जी़, भादौ में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल नहीं खाना चाहिए।

-स्वेच्छा से नियमित उपयोग के पदार्थों का त्याग करने का विधान है। जैसे मधुर स्वर के लिये गुड़, लंबी उम्र और संतान प्राप्ति के लिये तेल, शत्रु बाधा से मुक्ति के लिये कड़वा तेल, और सौभाग्य के लिये मीठे तेल का त्याग किया जाता है।

-इसके अलावा चातुर्मास में पान मसाला, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाना चाहिए।

पूजा उपवास से हमारा मानसिक विकास होता है-
आप 1 दिन भोजन ना करके किसी भूखे व्यक्ति को भोजन खिला सकते हैं। उपवास रखने पर हमें अन्य का महत्व समझ में आ जाता है।देव सेन एकादशी सी देवोत्थान एकादशी की विश्राम का महत्व विश्राम का हमारे जीवन में एक विशेष महत्व है। थका हुआ मन कोई भी विशिष्ट कार्य नहीं कर सकता है। मनुष्य का मन और तन जब तक थका हुआ है, तब तक वह घर-परिवार, समाज, राष्ट्र को अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान नहीं दे सकता।

यदि तनाव दूर करने के लिए हम किसी यात्रा पर जाते हैं, तो इसका सीधा उद्देश्य आप अपने मन को विश्राम दे रहे हैं। इस चातुर्मास के विश्राम से हम भरपूर ऊर्जा के साथ अपने कार्यों में लग जाते हैं और श्रीहरि का चयन भी इसी तथ्य को दर्शाता है। हम जीवन में विश्राम और अन्य का महत्व समझें यही देश है, एकादशी का महत्व है।

एकादशी पर एक निश्चित विश्राम के बाद भरपूर ऊर्जा के साथ अपने कार्य क्षेत्र में लगे रहना चाहिए। चातुर्मास में आम लोगों को स्वास्थ्य का ख्याल भी रखना चाहिए। पुराणों के अनुसार चातुर्मास मी शरीर की जठराग्नि कमजोर हो जाती है, जिसकी वजह से शरीर में विभिन्न तरह के वायरस प्रवेश कर जाते हैं। चित्र मास के बीच में ही पाने वाले सावन के महीने में लोगों को खास ख्याल रखना चाहिए। व्यास करण सावन के महीने में पधार भोजन करने से बचना चाहिए। 4 में भगवान विष्णु नक्क्षत्र दर्शन के बाद जो भोजन करता है वो आप ठीक और मानसिक रूप से स्वास्थ रहता है।

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