सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या मामले की सुनवाई पूरी, फैसला सुरक्षित

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 17-10-2019 / 9:56 AM
  • Update Date: 17-10-2019 / 9:56 AM

नई दिल्ली। प्राचीन इतिहास के पन्नों को पलटते हुए, धार्मिक मान्यताओं एवं परम्पराओं तथा पुरातात्विक सवालों पर विचारोत्तोजक बहस के बीच अयोध्या की विवादित जमीन से संबंधित मुकदमे पर 40 दिन तक जिरह होने के बाद इस ऐतिहासिक सुनवाई का बुधवार को सुनवाई पूरी हो गई है। अदालत ने फैसला सुरक्षित रखा है। सबसे आखिर में मुस्लिम पक्ष की ओर से दलीलें रखी गईं।

अब सुप्रीम कोर्ट ने लिखित हलफनामा, मोल्डिंग ऑफ रिलीफ को लिखित में जमा करने के लिए तीन दिन का समय दिया है। अब पूरे देश की निगाह मामले के फैसले पर टिकी है। भारतीय राजनीति पर तीन दशक से अधिक समय से छाये इस विवाद की सुनवाई के दौरान राम जन्मभूमि पर अपने दावे के पक्ष में जहां रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा, ऑल इंडिया हिन्दू महासभा, जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति एवं गोपाल सिंह विशारद ने दलीलें दी।

वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड, हासिम अंसारी, मोहम्मद सिद्दिकी, मौलाना मेहफुजुरहमान, फारुख अहमद और मिसबाहुद्दीन ने विवादित स्थल पर बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक का दावा किया। इस मामले में शीर्ष अदालत की ओर से न्यायमूर्ति मोहम्मद इब्राहिम कलीफुल्ला के नेतृत्व में गठित तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल की ओर से मध्यस्थता असफल रहने की बात बताये जाने के बाद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की संविधान पीठ ने नियमित सुनवाई की और सभी पक्षों को अपना-अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिये।

हिन्दू पक्ष की ओर से सबसे पहले ‘रामलला विराजमान’ के वकील के एस परासरण ने दलीलें शुरू की थी, जबकि सुनवाई का अंत सुन्नी वक्फ बोर्ड की जिरह से हुआ। चालीस दिन की सुनवाई के दौरान कई मौके ऐसे आये जब दोनों पक्षों के वकीलों में गर्मागर्म बहस हुई। आज की सुनवाई के दौरान तो धवन ने ऑल इंडिया हिन्दू महासभा के वकील विकास कुमार सिंह की ओर से अदालत के समक्ष सौंपे गये नक्शे को पीठ के सामने ही फाड़ दिया।

इससे पहले आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका की सुनवाई 38 दिनों तक चली थी जबकि 68 दिनों की सुनवाई के साथ ही केशवानंद भारती मामला पहले पायदान पर बना हुआ है। वर्ष 1973 में ‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा था कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए।

‘केशवानंद भारती बनाम केरल’ के मामले में 68 दिन तक सुनवाई हुई, यह तर्क-वितर्क 31 अक्टूबर 1972 को शुरू होकर 23 मार्च 1973 को खत्म हुआ था। आधार की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने सुनवाई की थी। इस बेंच में न्यायमूर्ति ए के सीकरी, न्यायमूर्ति ए एम खानविलकर, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल थे।

आधार मामले में 38 दिनों तक चली सुनवाई के बाद गत वर्ष 10 मई को फैसला सुरक्षित रख लिया गया था, जबकि इस पर गत वर्ष सितंबर में फैसला सुनाया गया था। इस मामले में विभिन्न सेवाओं में आधार की अनिवार्यता की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई थी। उच्चतम न्यायालय में लगभग अंतिम पड़ाव पर पहुंच चुकी अयोध्या विवाद की 39वें दिन की सुनवाई के दौरान हिन्दू और मुस्लिम पक्षकारों के वकीलों के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी और मुख्य न्यायाधीश को हस्तक्षेप करना पड़ा था।

परासरण ने कहा था कि अयोध्या में 50 से 60 मस्जिद हैं तथा मुस्लिम कहीं और भी जाकर नमाज पढ़ सकते हैं, लेकिन यह राम का जन्मस्थान है, इसे बदला नहीं जा सकता। उन्होंने अपनी दलील में कहा था कि किसी को भी भारत के इतिहास को तबाह करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। न्यायालय को इतिहास की गलती को ठीक करना चाहिए। एक विदेशी भारत में आकर अपने कानून लागू नहीं कर सकता है। उन्होंने अपनी दलील की शुरुआत भारत के इतिहास के साथ की थी।

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