पानीदार बुन्देलखण्ड, आषाढ़ में जो बरसा बस वही…

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 26-12-2015 / 5:17 PM
  • Update Date: 26-12-2015 / 5:17 PM

आषाढ़ में जो बरसा बस वही था, लगभग पूरा सावन-भादो निकल गया है और जो छिटपुट बारिश हुई है, उससे बुन्देलखण्ड फिर से अकाल-सूखा की ओर जाता दिख रहा है। यहाँ सामान्य बारिश का तीस फीसदी भी नहीं बरसा, तीन-चौथाई खेत बुवाई से ही रह गए और कोई पैंतीस फीसदी ग्रामीण अपनी पोटलियाँ लेकर दिल्ली-पंजाब की ओर काम की तलाश में निकल गए हैं।

मनरेगा में काम करने वाले मजदूर मिल नहीं रहे हैं। ग्राम पंचायतों को पिछले छह महीने से किये गए कामों का पैसा नहीं मिला है सो नए काम नहीं हो रहे हैं। सियासतदाँ इन्तजार कर रहे हैं कि कब लोगों के पेट से उफन रही भूख-प्यास की आग भड़के और उस पर वे सियासत की हांडी खदबदाएँ। हालांकि बुन्देलखण्ड के लिये यह अप्रत्याशित कतई नहीं है, बीते कई सदियों से यहाँ हर पाँच साल में दो बार अल्प वर्षा होती ही है।

गाँव का अनपढ़ भले ही इसे जानता हो, लेकिन हमारा पढ़ा-लिखा समाज इस सामाजिक गणित को या तो समझता नहीं है या फिर नासमझी का फरेब करता है, ताकि हालात बिगड़ने पर ज्यादा बजट की जुगाड़ हो सके। ईमानदारी से तो देश का नेतृत्व बुन्देलखण्ड की असली समस्या को समझ ही नहीं पा रहे हैं।

बुन्देलखण्ड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहाँ सदियों, पीढ़ियों से होता रहा है। पहले यहाँ के बाशिन्दे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आँधी में पारम्परिक जल-प्रबन्धन तंत्र नष्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली।

अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इन्तजार सभी को होता है- अफसरों, नेताओं सभी को। इलाके में पानी के पारम्परिक स्रोतों का संरक्षण व पानी की बबार्दी को रोकना, लोगों को पलायन के लिये मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये तीन उपचार बुन्देलखण्ड की तकदीर बदल सकते हैं।

मध्य प्रदेश के सागर सम्भाग के पाँच, दतिया, और जबलपुर, सतना जिलों का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के झाँसी सम्भाग के सभी सात जिले बुन्दलेखण्ड के पारम्परिक भूभाग में आते हैं। बुन्देलखण्ड की विडम्बना है कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक एक रूप भौगोलिक क्षेत्र होने के बावजूद यह दो राज्यों- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बँटा हुआ है।

कोई 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के इस इलाके की आबादी तीन करोड़ से अधिक है। यहाँ हीरा, ग्रेनाईट की बेहतरीन खदानें हैं, जंगल तेंदू पत्ता, आँवला से पटे पड़े हैं, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है। दिल्ली, लखनऊ और उससे भी आगे पंजाब तक जितने भी बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं उसमें अधिकांश में ह्यह्यगारा-गुम्माह्णह्ण (मिट्टी और ईंट) का काम बुन्देलखण्डी मजदूर ही करते हैं।

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