देश में जल प्रबन्धन से बढ़ता कृषि उत्पादन

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 26-12-2015 / 5:13 PM
  • Update Date: 26-12-2015 / 5:13 PM

देश में बड़ी संख्या में कृषि योग्य भूमि बाढ़ एवं जलभराव से प्रभावित है। करीब 60 फीसदी कृषि भूमि वर्षा पर आधारित है। मानसून की सक्रियता कहीं कम तो कहीं ज्यादा होने से बाढ़ व सूखे के हालात रहते हैं। बाढ़ के कारण कृषि योग्य भूमि प्रभावित होती है। इस भूमि को भी खेती योग्य बनाने के लिए सरकार की ओर से तमाम कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

भारत में सिंचाई कुप्रबंधन के कारण करीब छह-सात मिलियन हेक्टेयर भूमि लवणता से प्रभावित है। यह स्थिति पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में ज्यादा है। इसी तरह करीब छह मिलियन हेक्टेयर भूमि जल-जमाव से प्रभावित है। देश में पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा एवं उत्तर-पूर्वी राज्यों में जलजमाव की समस्या है।

असमतल भू-क्षेत्र वर्षा जल से काफी समय तक भरा रहता है। इसी तरह गर्मी के दिन में यह अधिक कठोर हो जाती है। ऐसे में इसकी अम्लता बढ़ जाती है और इसमें खेती नहीं हो पाती है। केन्द्र सरकार की ओर से प्रयास किया जा रहा है कि इस भूमि को खेती योग्य बनाए रखा जाए क्योंकि भारत में हर साल करीब छह हजार टन उपजाऊ ऊपरी मिट्टी का कटाव होता है।

पानी के साथ बहने वाली इस मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, कैल्शियम, मैगनिशियम के साथ ही अन्य सूक्ष्म तत्व भी बह जाते हैं। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि पौधे का प्रथम भोजन पानी माना गया है। पौधे को तैयार होने में करीब 90 फीसदी जल की आवश्यकता होती है। यह मिट्टी में उपस्थित तत्वों को भोजन के रूप में पौधे तक पहुँचाता है।

मिट्टी में समुचित आर्द्रता होना भी जरूरी होता है। मिट्टी में पानी का कम होना और अधिक होना दोनों ही बात पौधे को किसी न किसी रूप में प्रभावित करती हैं। इसलिए जल प्रबन्धन बेहद जरूरी है।

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