तुम न जाने किस जहां में खो गए – ओशो

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 12-07-2017 / 10:24 AM
  • Update Date: 12-07-2017 / 10:24 AM

यही तो प्रेम की मंजिलें हैं, यही तो उसके आगे के इम्तिहान हैं। आखिरी प्रेम का इम्तिहान यही है कि वहां प्रेमी खो जाता है। और जिस दिन खोता है उसी दिन पाता है, सब मिल गया। इसलिए प्रेम की भाषा गणित की भाषा नहीं है। प्रेम की भाषा हिसाब की भाषा नहीं है। प्रेम की भाषा तो पागलपन की भाषा है, दीवानगी की भाषा है, मतवालेपन की भाषा है। तो तरु से मैं कहूंगा, बजाय यह सोचने के कि ‘तुम न जाने किस जहां में खो गए’; बजाय यह सोचने के कि ‘मौत भी आती नहीं, सांस भी जाती नहीं, दिल को यह क्या हो गया’; सोचो–

आरजू तेरी बरकरार रहे
दिल का क्या है रहा न रहा

सब खो जाए, तो भी जो अमृत है वह तो नहीं खो जाता है। वही खोता है जो खो जा सकता है। और जो खो जा सकता है, वह जितनी जल्दी खो जाए उतना अच्छा है। क्योंकि जितनी देर उलझे रहे उतनी ही मुसीबत! जितनी देर उलझे रहे उतना ही समय गंवाया। जितनी जल्दी जागे उतना अच्छा। जितनी देर सोए उतनी ही रात, उतना ही व्यर्थ। ध्यान रहे कि मिटने की जितनी तैयारी होगी–और मिटना पीड़ापूर्ण है, इसे जानकर–उतनी ही जल्दी पीड़ा की रात का अंत आ जाता है। जब तक तुम नहीं मिटे हो तभी तक पीड़ा मालूम होती है–क्योंकि मिटना है…मिटना है…मिटते जाना है। जल्दी करो, मिट जाओ। स्वीकार कर लो मृत्यु को। वह भीतर जो एक लड़ाई चलती है बचने की, वह छोड़ दो। फिर पीड़ा भी समाप्त हो गयी। छोड़ते ही संघर्ष, पीड़ा समाप्त हो जाती है। लेकिन संकल्प आदमी का जन्मों-जन्मों का कमाया हुआ है, और समर्पण कठिन होता है। समर्पण भी हम करते हैं तो रत्ती-रत्ती करते हैं।

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