झूठ में एक गुण है – ओशो

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 12-07-2017 / 10:21 AM
  • Update Date: 12-07-2017 / 10:21 AM

एक बार एक पत्रकार मरा और स्वर्ग पहुंच गया। द्वार पर दस्तक दी। द्वारपाल ने द्वार खोला और पूछा कि क्या चाहते हैं? उसने कहा, मैं पत्रकार हूं और स्वर्ग में प्रवेश चाहता हूं। द्वारपाल हंसा और उसने कहा कि असंभव! तुम्हारे लिए ठीक-ठीक जगह तो नरक में है। तुम्हारा काम भी वहीं है। तुम्हें रस भी वहीं आएगा। तुम्हारा व्यवसाय वहीं फलता है। यहां तो सिर्फ, नरक से हम पीछे न पड़ जाएं, इसलिए चौबीस जगह खाली रखी हैं अखबार वालों के लिए। मगर वे कब की भरी हैं। चौबीस अखबार वाले हमारे यहां हैं। हालांकि वे भी सब बेकार हैं। अखबार छपता नहीं। एक कोरा कागज रोज बंटता है, ऋषि-मुनि उसको पढ़ते हैं। ऋषि-मुनि कोरे कागज ही पढ़ सकते हैं, क्योंकि कोरा मन और क्या पढ़ेगा!

अखबार में छपने योग्य घटना यहां घटती नहीं। जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने कहा है, कुत्ता अगर आदमी को काटे तो यह कोई समाचार नहीं है। आदमी जब कुत्ते को काटे तो यह समाचार है। नरक में खूब समाचार हैं, वहां आदमी कुत्तों को काटते हैं। और अखबार वालों को अगर न मिले ऐसा आदमी जो कुत्तों को काटता हो, तो उसे ईजाद करना होता है, नहीं तो अखबार मर जाए। उसका आविष्कार करना होता है, नहीं तो अखबार नहीं जी सकता। द्वारपाल ने कहा, यहां बेकार समय खराब करोगे। तुम्हारा मन भी न लगेगा। नरक चले जाओ, वहां रोज-रोज नये अखबार निकलते ही चले जाते हैं। सुबह का संस्करण भी निकलता है, दोपहर का संस्करण भी, सांझ का भी संस्करण, रात्रि का भी संस्करण।

खबरें इतनी हैं वहां! घटनाओं पर घटनाएं घटती हैं। स्वर्ग में कोई घटना थोड़े ही घटती है। महावीर बैठे अपने वृक्ष के नीचे, बुद्ध बैठे अपने वृक्ष के नीचे, मीरा नाचती रहती है अपने वृक्ष के नीचे। छापने को क्या है? कुछ नया वहां होता नहीं। लेकिन अखबार वाला इतनी आसानी से भाग तो नहीं जाता, इतनी जल्दी से हटाया भी नहीं जा सकता–पुरानी आदतें! उसने कहा, चौबीस घंटे का अवसर तो दो। अगर मैं किसी और अखबार वाले को जाने के लिए नरक राजी कर लूं, तो मुझे जगह दे सकोगे? द्वारपाल ने कहा, तुम्हारी मर्जी, अगर कोई राजी हो जाए। चौबीस घंटे का तुम्हें मौका है, भीतर चले जाओ।

उस अखबार वाले ने, जो वह जिंदगी भर करता रहा था, जिसमें कुशल था, वही काम किया। उसने जो मिला उसी से कहा कि अरे सुना तुमने! नरक में एक बहुत बड़े अखबार के निकलने की आयोजना चल रही है। प्रधान संपादक, उपप्रधान संपादक, संपादक, सब की जगह खाली है। बड़ी तनख्वाहें, कारें, बंगले,सब का इंतजाम है। सांझ होतेऱ्होते उसने चौबीसों अखबार वालों को मिल कर यह खबर पहुंचा दी। चौबीस घंटे पूरे होने पर वह द्वार पर पहुंचा। द्वारपाल ने कहा कि गजब कर दिया भाई तुमने! एक नहीं चौबीस ही चले गए! अब तुम मजे से रहो।

उसने कहा, मैं भी जाना चाहता हूं।
तुम किसलिए जाना चाहते हो?
उसने कहा, कौन जाने बात में सचाई हो ही!

झूठ में एक गुण है। चाहे तुम ही उसे शुरू करो, लेकिन अगर दूसरे लोग उस पर विश्वास करने लगें तो एक न एक दिन तुम भी उस पर विश्वास कर लोगे। जब दूसरों को तुम विश्वास करते देखोगे, उनकी आंखों में आस्था जगती देखोगे, तुम्हें भी शक होने लगेगा: कौन जाने, हो न हो सच ही हो बात! मैंने तो झूठ की तरह कही थी, लेकिन हो सकता है, संयोगवशात मैं जिसे झूठ समझ रहा था वह सत्य ही रहा हो! मेरे समझने में भूल हो गई हो। क्योंकि चौबीस आदमी कैसे धोखा खा सकते हैं? उसने कहा कि नहीं भाई, अब मैं रुकने वाला नहीं। पहले तो मुझे नरक जाने ही दो। स्वर्ग में अखबार नहीं निकलता, क्योंकि घटना नहीं घटती। शांत, ध्यानस्थ, निर्विकल्प समाधि में बैठे हों लोग तो क्या है वहां घटना? अखबार तो जीता है उपद्रव पर। जितना उपद्रव हो उतना अखबार जीता है। जहां उपद्रव नहीं है वहां भी अखबार वाला उपद्रव खोज लेता है। जहां बिलकुल खोज नहीं पाता वहां ईजाद कर लेता है।

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