जलग्रहण क्षेत्र संरक्षण में केन्द्र का योगदान

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 26-12-2015 / 5:15 PM
  • Update Date: 26-12-2015 / 5:15 PM

जलग्रहण क्षेत्र में भूमि संरक्षण के लिए केन्द्र प्रायोजित योजना तीसरी पंचवर्षीय योजना में शुरू की गई थी। इसके पश्चात 1978 में बाढ़ की विभीषिका को ध्यान में रखते हुए छठी पंचवर्षीय योजना में बाढ़ सम्भावित नदी योजना की शुरूआत की गयी थी। इन दोनों योजनाओं का नौवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान व्यय वित्त समिति की सिफारिश पर विलय कर दिया गया था और नवम्बर 2000 के बाद से वृहद प्रबन्धन विधि के अन्तर्गत सम्मिलित कर लिए गए थे।

कैचमेंट मैनेजमेंट आॅफ रीवर वैली प्रोजेक्ट एंड फ्लड प्रोन रिवर्स के कार्यक्रम के अन्तर्गत 27 राज्यों में 53 कैचमेंट्स को शामिल किया गया है। उस समय कुल जलग्रहण क्षेत्र 141 मिलियन हेक्टेयर था, जिसमें प्राथमिकता के आधार पर 2.8 करोड़ हेक्टेयर भूमि को तत्काल बचाए जाने की जरूरत बताई गई। वर्ष 2004-05 के दौरान 1894 करोड़ रुपये की लागत से इसमें से 60.8 हेक्टेयर भूमि का निदान किया गया।

इसके बाद हर साल करीब 0.17 मिलियन हेक्टेयर भूमि को लक्ष्य बनाया गया। अब स्थिति काफी सकारात्मक दिख रही है। विभिन्न राज्यों में इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य हुआ। जलग्रहण क्षेत्र विकास परियोजना को आठवी योजना के तहत 1994-95 से पूर्वोत्तर के सात राज्यों के झूम खेती वाले भागों में शुरू किया गया।

शत-प्रतिशत केन्द्रीय सहायता से चलने वाली इस योजना का लक्ष्य जलग्रहण क्षेत्र के आधार पर झूम इलाकों का पूर्ण विकास करना है। आठवीं योजना के दौरान पूर्वोत्तर के राज्यों द्वारा 31.51 करोड़ रुपये की लागत से 0.67 लाख हेक्टेयर भूमि का उपचार किया गया। वहीं नौवीं योजना के दौरान 82 करोड़ रुपये की लागत से 1.7 लाख हेक्टेयर भूमि का निदान किया गया है।

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