चावल उत्पादन में गहनीकरण पद्धति

  • ByJaianndata.com
  • Publish Date: 26-12-2015 / 5:16 PM
  • Update Date: 26-12-2015 / 5:16 PM

भारत में धान महत्त्वपूर्ण खाद्यान्न फसल है। राष्ट्रीय-स्तर पर धान की खेती करीब 4.5 करोड़ हेक्टेयर में की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों की ओर से चावल उत्पादन में चावल गहनीकरण पद्धति यानी एसआरआई (श्री) अपनाई जा रही है। श्री खेती के अन्तर्गत जलभराव होने पर धान जलमग्न नहीं होता है लेकिन वानस्पतिक अवस्था के दौरान मिट्टी को आर्द्र बनाए रखता है, बाद में सिर्फ एक इंच जल गहनता पर्याप्त होती है।

जबकि एसआरआई तकनीक में सामान्य की तुलना में सिर्फ आधे जल की आवश्यकता होती है। श्री खेती की उपयोगिता को देखते हुए वर्तमान में विश्वभर में लगभग एक लाख से ज्यादा किसान इस कृषि पद्धति से लाभ उठा रहे हैं। एसआरआई में धान की खेती के लिए बहुत कम पानी तथा कम खर्च की आवश्यकता होती है और उपज भी अच्छी होती है। छोटे और सीमान्त किसानों के लिए ये अधिक लाभकारी है।

एसआरआई तकनीक (श्री) के इतिहास पर गौर करें तो वर्ष 1980 के दशक के दौरान मेडागास्कर में पहली बार इस तकनीक को विकसित किया गया। इसका क्षमता परीक्षण चीन, इंडोनेशिया, कम्बोडिया, थाइलैंड, बांग्लादेश, श्रीलंका एवं भारत में किया गया। आंध्र प्रदेश में वर्ष 2003 में एसआरआई की खरीफ फसल के दौरान राज्य के 22 जिलों में परीक्षण किया गया। इस पद्धति से धान की खेती को लेकर औपचारिक प्रयोग वर्ष 2002-03 में प्रारम्भ हुआ।

अब तक इस पद्धति को आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ एवं गुजरात में प्रारंभ किया गया है। इस विधि की खासियत यह है कि इसमें मात्र दो किलोग्राम धान बीज एक एकड़ खेत के लिए पर्याप्त होता है। इतना ही नहीं इसकी रोपाई के लिए नर्सरी की उम्र सिर्फ 8 से 10 दिन रखी जाती है। इससे बीज की मात्रा कम लगती है तो दूसरी तरफ नर्सरी तैयार होने में लगने वाला समय बचता है।

इतना ही नहीं आमतौर पर परम्परागत तकनीक से होने वाली धान की खेती की अपेक्षा इस तकनीक में पैदावार भी अधिक होती है। एसआरआई तकनीक से धान की खेती में 2 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर बीज की और प्रति यूनिट 25-25 सेन्टीमीटर क्षेत्रफल की दर से कुछ पौधों की आवश्यकता होती है। जबकि धान की पारम्परिक सघन कृषि में प्रति एकड़ 20 किलो की दर से बीज की आवश्यकता होती है।

इस तकनीक से धान की पौध में 8 से 12 दिन बाद जब दो छोटी पत्तियाँ दिखने लगें तभी रोपाई कर देनी चाहिए। रोपाई में अभिघात को कम करें। धान के छोटे पौधे को नर्सरी से बीज, मिट्टी और जड़सहित सावधानीपूर्वक उखाड़कर कम गहराई पर उसकी रोपाई करनी चाहिए।

Share This Article On :

BIG NEWS IN BRIEF